पचास पार कर लिए अब भी इंतज़ार है
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेकरार है
गुरुर टूटने पे ही समझ सका सचाई को
जो है तो बस खुदा को ज़िन्दगी पे इख्तिअर है
मेरे लबो पे भी ज़रूर आएगी हसी कभी
न जाने कब से मेरे आईने को इंतज़ार है
मैं नाम के लिए ही भागता रहा तमाम उम्र
वो मिल गया तो दिल मेरा क्यो अब भी बेकरार है
मैं तेरी याद दफ़न भी करू तो तू बता कहा
ke तू ही तू फकत हरेक शकल मैं शुमार है
अभी तो हाथ जोड़ कर जो कह रहा है वोट दो
अवाम को पता है ख़ुद गरज वो होशियार है
डगर डगर नगर नगर मैं भागता रहा मगर
सुकू नही मिला कही न मिल सका करार है
वो क्यो यूं तुल गया है अपनी जान देने के लिए
दुखी है जग से या जुडा खुदा से उसका तार है
कभी तो आएगी मेरे हयात मैं उदासियाँ
बहुत दिनों से दोस्तों को इसका इंतज़ार है
जगदीश रावतानी
Wednesday, April 22, 2009
Tuesday, April 14, 2009
जगदीश रावतानी - ९वि आनंदम काव्य घोष्टि
आनंदम काव्य गोष्टी १२ तारीख को जगदीश रावतानी के निवास स्थान पर संपन हुई । इसमे शरीक कविगणों के नाम है : अनुराधा शर्मा , संजीव कुमार , सक्षर्था भसीन , मुनवर सरहदी, दरवेश भरती, मनमोहन तालिब, ज़र्फ़ देहलवी, डॉ विजय कुमार, शिलेंदर सक्सेना , प्रेम सहजवाला शहदत्त अली निजामी, दर्द देहलवी, मजाज़ साहिब, नूर्लें कौसर कासमी , रमेश सिद्धार्थ , अख्तर आज़मी, अहमद अली बर्की, दिक्सित बकौरी, डॉ शिव कुमार, अनिल मीत , इंकलाबी जी और जगदीश रावतानी। घोषति की अध्येक्ष्ता दरवेश भरती जी ने की । सचालन जगदीश रावतानी ने किया।
एक सार्थक बहस भी की गयी जिसका विषय था "साहित्य की दशा और दिशा " जिसमे डॉ रमेश सिद्धार्थ , डॉ विजय कुमार, कुमारी अनुराधा शर्मा और डॉ दरवेश भारती ने अपने विचार रखे।
काव्य घोश्ती की शुरुआत से पहले ये दुखद सुचना दी गयी के जाने माने साहित्येकर विष्णु प्रभाकर जी का देहांत हो गया है । एक और दुखद समाचार यह था के श्री बलदेव वंशी जी के जवान पुत्र का भी हाल ही मैं देहांत हो गया .
दो मिनट का मौन धारण कर के उनकी आत्माओं की शान्ति और परिवार के सद्सियो को सदमा बर्दाशत करने की हिमत के लिए प्रार्थना की गयी ।
दो मिनट का मौन धारण कर के उनकी आत्माओं की शान्ति और परिवार के सद्सियो को सदमा बर्दाशत करने की हिमत के लिए प्रार्थना की गयी ।
काव्य घोस्टी मैं पढ़े गए कुछ कवियों के कुछ शेर/ पंक्तिया प्रस्तुत है ।
डॉ अहमद अली बर्की :
वह मैं हु जिसने की उसकी हमेशा नाज़बर्दारी
मगर मैं जब रूठा मानाने तक नही पंहुचा
लगा दी जिसकी खातिर मैंने अपनी जान की बाज़ी
वह मेरी कबर पर आंसू बहाने तक नही पंहुचा
अख्तर आज़मी :
ख़ुद गरज दुनिया है इसमे बाहुनर हो जाइए
आप अपने आप से ख़ुद बाखबर हो जाइये
जिसका साया दूसरो के द्वार के आंगन को मिले
ज़िन्दगी की धुप मैं ऐसा शजर हो जाइये
डॉ विजय कुमार
प्यासी थी ये nazaraN tera दीदार हो गया
नज़रो मैं बस गया तू और तुझसे प्यार हो गया
डॉ दरवेश भारती :
इतनी कड़वी ज़बान न रखो
डोर रिश्तो की टूट जायेगी
जगदीश रावतानी :
जहा जहा मैं गया इक जहा नज़र आया
हरेक शे मैं मुझे इक गुमा नज़र आया
जब आशियाना मेरा खाक हो गया जलकर
पड़ोसियों को मरे तब धुँआ नज़र आया
पड़ोसियों को मरे तब धुँआ नज़र आया
मुनवर सरहदी :
ज़िन्दगी गुज़री है यु तो अपनी फर्जानो के साथ
रूह को राहत मगर मिलती है दीवानों के साथ ]
घोश्ती का समापन दरवेश भरती जी के व्याख्यान और उनकी एक रचना के साथ हुआ । जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया .
Sunday, April 5, 2009
Wednesday, April 1, 2009
Friday, March 20, 2009
जगदीश रावतानी की एक ग़ज़ल
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1956 मे जन्मे जगदीश रावतानी प्रसिद्व कवि हैं और इन्होंने छोटे पर्दे पर कई धारावाहिकों मे अभिनय भी किया है.कई प्रतिभाओं के मालिक हैं जगदीश जी. आज की ग़ज़ल के पाठकों के लिए उनकी एक ग़ज़ल पेश है :
गो मैं तेरे जहाँ मैं ख़ुशी खोजता रहा
लेकिन ग़मों-अलम से सदा आशना रहा
हर कोई आरजू में कि छू ले वो आसमा
इक दूसरे के पंख मगर नोचता रहा
आँखों मैं तेरे अक्स का पैकर तराश कर
आइना रख के सामने मैं जागता रहा
कैसे किसी के दिल में खिलाता वो कोई गुल
जो नफरतों के बीज सदा बीजता रहा
आती नज़र भी क्यूं मुझे मंजिल की रौशनी
छोडे हुए मैं नक्शे कदम देखता रहा
सच है कि मैं किसी से मुहव्बत न कर सका
ता उम्र प्रेम ग्रंथ मगर बांचता रहा
-221 2121 1221 2 12
जगदीश रावतानी की एक ग़ज़ल
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1956 मे जन्मे जगदीश रावतानी प्रसिद्व कवि हैं और इन्होंने छोटे पर्दे पर कई धारावाहिकों मे अभिनय भी किया है.कई प्रतिभाओं के मालिक हैं जगदीश जी. आज की ग़ज़ल के पाठकों के लिए उनकी एक ग़ज़ल पेश है :
गो मैं तेरे जहाँ मैं ख़ुशी खोजता रहा
लेकिन ग़मों-अलम से सदा आशना रहा
हर कोई आरजू में कि छू ले वो आसमा
इक दूसरे के पंख मगर नोचता रहा
आँखों मैं तेरे अक्स का पैकर तराश कर
आइना रख के सामने मैं जागता रहा
कैसे किसी के दिल में खिलाता वो कोई गुल
जो नफरतों के बीज सदा बीजता रहा
आती नज़र भी क्यूं मुझे मंजिल की रौशनी
छोडे हुए मैं नक्शे कदम देखता रहा
सच है कि मैं किसी से मुहव्बत न कर सका
ता उम्र प्रेम ग्रंथ मगर बांचता रहा
-221 2121 1221 2 12
Saturday, March 21, 2009
Monday, February 9, 2009
ANANDAM KAVYA GOSHTI-8TH FEB 09
ANANDAM ORGANIZED A KAVYA GOSHTI ON 8TH FEB 09 AT THE RESIDECE OF ORGANIZATION SECRETARY SH JAGDISH RAWTANI. POETS WHO PARTICIPATED IN THE GOSHTI ARE:
S/SH MUNAVAR SARHADI, RAMESH SIDHARTHA, ZARF DEHLVI, RAMESH THAKUR, SHOBNA MITTAL, SHAILESH SAXENA, DR M TALIB, PANDIT PREM BARAILVI, PREMCHAND SAHEJWALA, BHOOPENDER KUMAR, QAISAR AZIZ, KAILASH DAHIYA, SAKSHAT BHASIN, VEERENDER KAMAR, ASHISH SINHA KASID, JITENDER PREETAM, JAGDISH RAWTANI. THERE WAS GREAT VARIETY OF POETRY IN THE FORM OF GAZAL, KAVITA NAZAM AND DOHA. THE COMBINATION OF NEW TALENTED POETS AND EXPERIENCED POETS WAS WORTH WATCHING. THERE WAS ALSO A LOVEABLE COMBINATION OF HINDI AND URDU POETRY AND THAT WAS ENJOYED AND APPRECIATED BY ONE AND ALL PRESENT IN THE GOSHTI. THE PROGRAMME WAS COMPEERED BY SH PREM SAHEJWALA. AT THE END OF THIS DAY POETRY SESSION SH JAGDISH RAWTANI THANKED EVERY ONE FOR COMING AND MAKING THE EVENING BEAUTIFUL AND MEMORABLE.
S/SH MUNAVAR SARHADI, RAMESH SIDHARTHA, ZARF DEHLVI, RAMESH THAKUR, SHOBNA MITTAL, SHAILESH SAXENA, DR M TALIB, PANDIT PREM BARAILVI, PREMCHAND SAHEJWALA, BHOOPENDER KUMAR, QAISAR AZIZ, KAILASH DAHIYA, SAKSHAT BHASIN, VEERENDER KAMAR, ASHISH SINHA KASID, JITENDER PREETAM, JAGDISH RAWTANI. THERE WAS GREAT VARIETY OF POETRY IN THE FORM OF GAZAL, KAVITA NAZAM AND DOHA. THE COMBINATION OF NEW TALENTED POETS AND EXPERIENCED POETS WAS WORTH WATCHING. THERE WAS ALSO A LOVEABLE COMBINATION OF HINDI AND URDU POETRY AND THAT WAS ENJOYED AND APPRECIATED BY ONE AND ALL PRESENT IN THE GOSHTI. THE PROGRAMME WAS COMPEERED BY SH PREM SAHEJWALA. AT THE END OF THIS DAY POETRY SESSION SH JAGDISH RAWTANI THANKED EVERY ONE FOR COMING AND MAKING THE EVENING BEAUTIFUL AND MEMORABLE.
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