जगदीश रावतानी की ग़ज़लें हृदय को आंदोलित करती हैं।
-भूपेन्द्र
Monday, May 18, 2009
Friday, April 24, 2009
रावतानी की ग़ज़ल
जिंदगी को सजा नही पाया
बोझ इसका उठा नही पाया
खूब चश्मे बदल के देख लिए
तीरगी को हटा नही पाया
प्यार का मैं सबूत क्या देता
चीर कर दिल दिखा नही पाया
जो थका ही नही सज़ा देते
वो खता क्यों बता नही पाया
वो जो बिखरा है तिनके की सूरत
बोझ अपना उठा नही पाया
आईने में खुदा को देखा जब
ख़ुद से उसको जुदा नही पाया
नाम जगदीश है कहा उसने
और कुछ भी बता नही पाया
Wednesday, April 22, 2009
पचास पार कर लिए अब भी इंतज़ार है
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेकरार है
गुरुर टूटने पे ही समझ सका सचाई को
जो है तो बस खुदा को ज़िन्दगी पे इख्तिअर है
मेरे लबो पे भी ज़रूर आएगी हसी कभी
न जाने कब से मेरे आईने को इंतज़ार है
मैं नाम के लिए ही भागता रहा तमाम उम्र
वो मिल गया तो दिल मेरा क्यो अब भी बेकरार है
मैं तेरी याद दफ़न भी करू तो तू बता कहा
ke तू ही तू फकत हरेक शकल मैं शुमार है
अभी तो हाथ जोड़ कर जो कह रहा है वोट दो
अवाम को पता है ख़ुद गरज वो होशियार है
डगर डगर नगर नगर मैं भागता रहा मगर
सुकू नही मिला कही न मिल सका करार है
वो क्यो यूं तुल गया है अपनी जान देने के लिए
दुखी है जग से या जुडा खुदा से उसका तार है
कभी तो आएगी मेरे हयात मैं उदासियाँ
बहुत दिनों से दोस्तों को इसका इंतज़ार है
जगदीश रावतानी
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेकरार है
गुरुर टूटने पे ही समझ सका सचाई को
जो है तो बस खुदा को ज़िन्दगी पे इख्तिअर है
मेरे लबो पे भी ज़रूर आएगी हसी कभी
न जाने कब से मेरे आईने को इंतज़ार है
मैं नाम के लिए ही भागता रहा तमाम उम्र
वो मिल गया तो दिल मेरा क्यो अब भी बेकरार है
मैं तेरी याद दफ़न भी करू तो तू बता कहा
ke तू ही तू फकत हरेक शकल मैं शुमार है
अभी तो हाथ जोड़ कर जो कह रहा है वोट दो
अवाम को पता है ख़ुद गरज वो होशियार है
डगर डगर नगर नगर मैं भागता रहा मगर
सुकू नही मिला कही न मिल सका करार है
वो क्यो यूं तुल गया है अपनी जान देने के लिए
दुखी है जग से या जुडा खुदा से उसका तार है
कभी तो आएगी मेरे हयात मैं उदासियाँ
बहुत दिनों से दोस्तों को इसका इंतज़ार है
जगदीश रावतानी
Tuesday, April 14, 2009
जगदीश रावतानी - ९वि आनंदम काव्य घोष्टि
आनंदम काव्य गोष्टी १२ तारीख को जगदीश रावतानी के निवास स्थान पर संपन हुई । इसमे शरीक कविगणों के नाम है : अनुराधा शर्मा , संजीव कुमार , सक्षर्था भसीन , मुनवर सरहदी, दरवेश भरती, मनमोहन तालिब, ज़र्फ़ देहलवी, डॉ विजय कुमार, शिलेंदर सक्सेना , प्रेम सहजवाला शहदत्त अली निजामी, दर्द देहलवी, मजाज़ साहिब, नूर्लें कौसर कासमी , रमेश सिद्धार्थ , अख्तर आज़मी, अहमद अली बर्की, दिक्सित बकौरी, डॉ शिव कुमार, अनिल मीत , इंकलाबी जी और जगदीश रावतानी। घोषति की अध्येक्ष्ता दरवेश भरती जी ने की । सचालन जगदीश रावतानी ने किया।
एक सार्थक बहस भी की गयी जिसका विषय था "साहित्य की दशा और दिशा " जिसमे डॉ रमेश सिद्धार्थ , डॉ विजय कुमार, कुमारी अनुराधा शर्मा और डॉ दरवेश भारती ने अपने विचार रखे।
काव्य घोश्ती की शुरुआत से पहले ये दुखद सुचना दी गयी के जाने माने साहित्येकर विष्णु प्रभाकर जी का देहांत हो गया है । एक और दुखद समाचार यह था के श्री बलदेव वंशी जी के जवान पुत्र का भी हाल ही मैं देहांत हो गया .
दो मिनट का मौन धारण कर के उनकी आत्माओं की शान्ति और परिवार के सद्सियो को सदमा बर्दाशत करने की हिमत के लिए प्रार्थना की गयी ।
दो मिनट का मौन धारण कर के उनकी आत्माओं की शान्ति और परिवार के सद्सियो को सदमा बर्दाशत करने की हिमत के लिए प्रार्थना की गयी ।
काव्य घोस्टी मैं पढ़े गए कुछ कवियों के कुछ शेर/ पंक्तिया प्रस्तुत है ।
डॉ अहमद अली बर्की :
वह मैं हु जिसने की उसकी हमेशा नाज़बर्दारी
मगर मैं जब रूठा मानाने तक नही पंहुचा
लगा दी जिसकी खातिर मैंने अपनी जान की बाज़ी
वह मेरी कबर पर आंसू बहाने तक नही पंहुचा
अख्तर आज़मी :
ख़ुद गरज दुनिया है इसमे बाहुनर हो जाइए
आप अपने आप से ख़ुद बाखबर हो जाइये
जिसका साया दूसरो के द्वार के आंगन को मिले
ज़िन्दगी की धुप मैं ऐसा शजर हो जाइये
डॉ विजय कुमार
प्यासी थी ये nazaraN tera दीदार हो गया
नज़रो मैं बस गया तू और तुझसे प्यार हो गया
डॉ दरवेश भारती :
इतनी कड़वी ज़बान न रखो
डोर रिश्तो की टूट जायेगी
जगदीश रावतानी :
जहा जहा मैं गया इक जहा नज़र आया
हरेक शे मैं मुझे इक गुमा नज़र आया
जब आशियाना मेरा खाक हो गया जलकर
पड़ोसियों को मरे तब धुँआ नज़र आया
पड़ोसियों को मरे तब धुँआ नज़र आया
मुनवर सरहदी :
ज़िन्दगी गुज़री है यु तो अपनी फर्जानो के साथ
रूह को राहत मगर मिलती है दीवानों के साथ ]
घोश्ती का समापन दरवेश भरती जी के व्याख्यान और उनकी एक रचना के साथ हुआ । जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया .
Sunday, April 5, 2009
Wednesday, April 1, 2009
Friday, March 20, 2009
जगदीश रावतानी की एक ग़ज़ल
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1956 मे जन्मे जगदीश रावतानी प्रसिद्व कवि हैं और इन्होंने छोटे पर्दे पर कई धारावाहिकों मे अभिनय भी किया है.कई प्रतिभाओं के मालिक हैं जगदीश जी. आज की ग़ज़ल के पाठकों के लिए उनकी एक ग़ज़ल पेश है :
गो मैं तेरे जहाँ मैं ख़ुशी खोजता रहा
लेकिन ग़मों-अलम से सदा आशना रहा
हर कोई आरजू में कि छू ले वो आसमा
इक दूसरे के पंख मगर नोचता रहा
आँखों मैं तेरे अक्स का पैकर तराश कर
आइना रख के सामने मैं जागता रहा
कैसे किसी के दिल में खिलाता वो कोई गुल
जो नफरतों के बीज सदा बीजता रहा
आती नज़र भी क्यूं मुझे मंजिल की रौशनी
छोडे हुए मैं नक्शे कदम देखता रहा
सच है कि मैं किसी से मुहव्बत न कर सका
ता उम्र प्रेम ग्रंथ मगर बांचता रहा
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जगदीश रावतानी की एक ग़ज़ल
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1956 मे जन्मे जगदीश रावतानी प्रसिद्व कवि हैं और इन्होंने छोटे पर्दे पर कई धारावाहिकों मे अभिनय भी किया है.कई प्रतिभाओं के मालिक हैं जगदीश जी. आज की ग़ज़ल के पाठकों के लिए उनकी एक ग़ज़ल पेश है :
गो मैं तेरे जहाँ मैं ख़ुशी खोजता रहा
लेकिन ग़मों-अलम से सदा आशना रहा
हर कोई आरजू में कि छू ले वो आसमा
इक दूसरे के पंख मगर नोचता रहा
आँखों मैं तेरे अक्स का पैकर तराश कर
आइना रख के सामने मैं जागता रहा
कैसे किसी के दिल में खिलाता वो कोई गुल
जो नफरतों के बीज सदा बीजता रहा
आती नज़र भी क्यूं मुझे मंजिल की रौशनी
छोडे हुए मैं नक्शे कदम देखता रहा
सच है कि मैं किसी से मुहव्बत न कर सका
ता उम्र प्रेम ग्रंथ मगर बांचता रहा
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